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गुरुवार, 15 सितंबर 2016

मेरे दोस्तों की खूबसूरत सी बातें ..



अब ये जरूरी तो नहीं कि दोस्त जो भी कहें उसके लिए उन्हें ब्लॉगपोस्ट तक पहुंचना  ही पड़े | असल में मित्र सूची में इतने गुनी और कमाल की प्रतिभा के मालिक लोग हैं कि मन करता है एक एक शब्द को सहेज लिया जाए , कुछ को साझा कर लेता हूँ अपने और अपने मित्र समूह के लिए , यही सोच कर ब्लॉग्गिंग में भी और ब्लॉग पोस्ट में भी दोस्तों की बतकही , दोस्तों के सपने , दोस्तों की ठिठोली , दोस्तों का गुस्सा , दोस्तों का प्यार सब कुछ सहेज लेता हूँ यदा कदा ...समय समय पर खुद भी पलट के पढूं तो आनंद दूना तिगुना होता जाता है ......मित्रता जिंदाबाद , दोस्त जिंदाबाद



कुल मिलाकर दुनिया में आपका सबसे अच्छा और सच्चा मित्र वहीं है जो iPhone 6S या iPhone 6S Plus गिफ्ट कर दे. आज ही दाम 22 हजार रुपये कम हुआ है. पृथ्वी वीरों से खाली कब रही है!


गंदे पानी में नॉर्मल मच्छर पनपता है। साफ पानी में डेंगू का मच्छर पनपता है। सवाल ये है कि पानी को कितना गंदा रखा जाए कि मच्छर पैदा ही न हो।


Samvedna Duggal feeling awesome.
आज पहली बार बैठी हवाई जहाज़ में ..!!
बादलों के बीच ढूंढती रही अपने सपनों के चाँद, सूरज, तारे ..और ....



"जहाँ ज़रूरत हो माफ़ी माँगो लेकिन माफ़ करने की जगह वहाँ भी रखो जहाँ बहुत ज़रूरी नहीं. संसार के बड़े सारे लेन-देन हैं, सो उन्हें चुकता करते चलो. थप्पड़ तुमने पहले भी बहुतेरों को रसीदे हैं, आगे भी कहीं वक़्त- मौक़ा पड़ जाए तो रसीदने से न हिचकना. ये उस बड़े से लेन-देन का ही छोटा-सा हिस्सा है. क्या हम पहले ही इस बात पर चर्चा नहीं कर चुके हैं कि शाओलिन आत्मरक्षा की विधि नहीं बल्कि ध्यान का ही एक चरण है ? अपने शाओलिन चरणों में सजगता से उतरो.
बाक़ी अपने शान्ति के क्षणों में उन सब को प्रणाम करते चलो जो तुम्हारे लिए ये परिस्थितियाँ गढ़ रहे हैं. आगे भी गढ़ेंगे. सारे लोग, सारी परिस्थितियाँ गुरू हैं. समय गुरू है. सबक पक्की कॉपी में दर्ज करते चलो. सबको धन्यवाद देते चलो."
बीते हफ़्ते माँ ने मुझसे ये बातें कहीं.
**
सितम्बर की इस दोपहर मन भरा-भरा और मौसम हरा-हरा है. गणपति को विदाई देती सड़कें भीग रही हैं. इधर मेरे कमरे के झीने अँधेरे को मुंशी खान की आवाज़ की मद्धम रौशनी चीर रही है. हवाओं की ख़बर पर यक़ीन करें तो साँझ ढलने के पहले मुहब्बत का कोई फ़रिश्ता दरवाज़े पर दस्तक देगा. शुक्रिया और सलामी का इससे मुफ़ीद वक़्त भला क्या होगा ?
सभी मित्रों-अमित्रों, कुमित्रों-सुमित्रों व विश्वामित्रों तक बाबुषा का धन्यवाद व प्रणाम पहुँचे.
【मम्मम् शरणम् गच्छामि】




मुलायम- तू हम्मसे चाताका है? (तू हमसे चाहता क्या है?)
अखिलेश- कुन्नैह (कुछ नहीं)



कल मेरे ऑफिस में अमेरीका निवासी जो यहाँ पिछले पाँच साल से रह रहे हैं आये... ब्रॉड स्कोट... जी कुछ देर उनके सवालों का जवाब अंग्रेज़ी में देती रही अचानक उन्होंने पूछा,"आप कहाँ की रहने वाली हैं, इंडिया में वाइफ़ को पति का सरनेम लिखना होता है लेकिन आपने अपना नाम सुनीता शानू बताया है मिसेज पवन, आपने एेसा क्यूँ किया? सबसे पहले तो यह सवाल मेरे लिये अप्रत्याशित था, दूसरे किसी अंग्रेज़ के मुँह से इतनी अच्छी हिन्दी सुनना सचमुच बहुत अच्छा लगा, मैने कहा मेरी मर्ज़ी है मै सुनीता चोटिया लिखूँ या शानू लिखू...शायद मेरी मर्ज़ी शब्द उन्हे रूचिकर नहीं लगा, या पहली बार सुना हो, कई बार मेरे शब्दों को दोहराते हुये उन्होंने कहा... आई लव इंडिया, मुझे बहुत पसंद है... तो ठीक है चाय के साथ बिस्कुट चलाइये कहें तो छोले भटूरे भी मँगवा दें, कोई हमारी माँ से प्रेम करे तो मेहमान नवाजी में हर भारतीय पीछे नहीं हटते... जय हिन्दी।


'मृत्युंजय पढ़ते हुए एक ख्याल आया था ....इसमें जिक्र है कि कर्ण रोज स्नान करने के बाद हीरे, मोती,जवाहरात दान किया करते थे ।
जब वे युद्ध मैदान में घायल पड़े थे और मृत्यु के समीप थे तो उन्होंने सुना..एक वृद्ध रोते हुए कह रहा था ,' मैं युद्ध में शहीद अपने पुत्र का अंतिम संस्कार कैसे करूँ, मेरे पास कुछ भी नहीं है ...कर्ण होते तो उनसे धन मांग लेता ।उनसे कई बार धन दान लिया है '
कर्ण भी वृद्ध को पहचान गए ।उन्होंने कई बार उस वृद्ध को दान दिया था ।पर अभी उनके पास कुछ नहीं था ।उन्होंने अपने पुत्र से कहा कि एक पत्थर लेकर मेरा दांत तोड़ दो और उसमें लगा सोना उस वृद्ध को दे दो ।ऐसा ही किया गया ।
कर्ण की दानशीलता प्रसिद्ध है पर एक सवाल उठता है मन में ।बार बार दान लेने के बाद भी कोई गरीब कैसे बना रह सकता है ।और राजा को रोज धन दान करने से बेहतर ये उपाय नहीं करने चाहिए थे कि कोई गरीब ही ना रहे ।किसी को हाथ ही ना फैलाना पड़े ।
एक पुरानी पोस्ट जिसमें जिक्र है कि एक सज्जन सड़क पर रहने वाली एक बूढी महिला को रोज चाय नाश्ता देते हैं ।कई वर्षों से सड़क पर रहते कुछ वृद्ध -वृद्धाओं को लगातार देख रही हूँ ।वे साफ़ कपड़ों में स्वस्थ दिखते हैं ।इसका अर्थ हमारी कॉलोनी वाले उनका अच्छी तरह ख्याल रख रहे हैं ।अब राजा तो हैं नहीं कि उन्हें घर और कारोबार मुहैया करवाएं ।हम लोग बस इतना ही कर सकते हैं ।




दिल्ली की ज़ीरो-सीट पार्टी की छटपटाहट ग़ज़ब है
बेचारे माकन को हर रोज़ कोई नया बहाना ढूंढना होता है टीवी पर दिखने का.
और अभी चुनाव भी इतने दूर हैं कि लगता है, तब तक तो पूरा ख़र्च हो लेगा ये


"मुद्दते बीत गई ख्वाब सुहाना देखे;
जगता रहता है हर नींद में बिस्तर मेरा!"



खबर: एप्पल के स्टोर पर बुधवार से ही लोग बोरा बिस्तर और तंबू लेकर लाइन में लग जाएंगे ताकि शुक्रवार को फोन पा सकें....
वाकई में सही बात है कि जब तक सलीमा और मोबाइल रहेगा... लोग बेवकूफ बनते रहेंगे... (रमाधीर सिंह साहब से क्षमा सहित ;) )





 
ज़िन्दगी.... एक चिट्ठी से दूसरी चिट्ठी तक का इंतज़ार भी होती है.....!



घर का कम्प्यूटर बिगड़ जाए
तो माता-पिता कहते हैं
बच्चों ने बिगाड़ा है
और अगर बच्चे बिगड़ जाएं
तो कहते हैँ
कम्प्यूटर ने बिगाड़ा है।



मने शिवपालगंज के कुसहर प्रसाद को उनके बेटे छोटे पहलवान ने परंपरानुसार फिर एक लाठी जमा ही दी। महीने में एक दो बार टुर्र-पुर्र के चलते लाठी जमाने की फ्रिकवेंसी बरकरार है। कुसहर घायल होने से हाहू हाहू करते चले जा रहे हैं.....तिस पर अपने बेटे की ताकत का बखान सुन प्रसन्न भी हो रहे हैं।
.....और छोटे पहलवान कह रहे हैं -
"गुरु, बाप जैसा बाप हो, तब तो एक बात भी है" !


समाचार चैनलों को देखते हुए जब स्पीड न्यूज, बुलेट न्यूज, एक मिनट में 5 न्यूज 10 न्यूज.. टाइप कार्यक्रमों से पाला पड़ता है तब फिल्म 'अमर अकबर एंथोनी' का यह डॉयलॉग खूब याद आता है-
"ऐसा तो आदमी लाइफ में दोइच टाइम भागता है, ओलंपिक का रेस हो या पुलिस का केस हो । "


उनके बीच मतभेद इस कदर बढ गये कि उन्होंने बयान जारी कर दिया - ’हमारे बीच कोई मतभेद नहीं है ।’


इक गुज़ारिश है अगर मानो तो
क्या हक़ीक़त है पहले जानो तो
दर-ए-ख़ुल्द वा है आप ही के दर से
अपने अंदर के ख़ुदा की जो मानो तो.... विजय "अंजुमन"



इस दुनिया में जो भी चीज़ें दिखती हैं / विद्दमान हैं ,उन्हें या तो 'ईश्वर' ने बनाया है या 'इंजीनियर्स' ने । अब आगे क्या कहें ,बधाई तो बनती है 'आज' की ।


इसी सप्ताहांत से बहुत समय से बंद पड़े कालम "ब्लॉग बातें " ..जिसमें किसी एक विषय पर लिखी गयी बहुत सारी ब्लॉग पोस्टों की उन ब्लोग्स के पते और ब्लोगर के नाम के साथ ,उद्देश्य सिर्फ आम पाठकों ,प्रिंट व् अन्य माध्यमों ,तक ब्लॉग सूत्रों को पहुंचाना .....एक तरह की लघु रिपोर्ट ...साप्ताहिक रहेगी ..फिलहाल हिंदी दिवस और हिंदी पर लिखी पोस्टों की कतरनों को संभाल रहा हूँ ....हिंदी ब्लोगिंग के लिए लिए बहुत कुछ किया जाना शेष है , जिसमें सबसे पहला है ,,,हिंदी में ब्लॉग्गिंग करना ....ब्लॉग पोस्ट तो हम लिख ही रहे हैं .....मगर ब्लॉग्गिंग में फर्क है .....फिर हिंदी में तो अभी हम वर्गीकृत भी नहीं हुए हैं विशेषज्ञता तो बहुत दूर की बात है ....

सोमवार, 23 जुलाई 2012

हिंदी तो उनका कुत्ता भी लिख लेता है .,



"
इस देश में हिंदी को गरियाने , धकियाने , धमकाने वाले लोगों को तलाशने के लिए आपको ज्यादा मेहनत नहीं करनी पडती है । न ही ऐसा है कि वे किसी अहिन्दी भाषी प्रदेश या देश से आते हैं , न न न न वे अंग्रेज , ब्रिटिश  , फ़्रांसीसी आदि भी नहीं हैं , वे आपके हमारे बीच के अपने हमारे मित्र/सखा /दोस्त और परिचित ही हैं । भाषा साहित्य कोई भी बुरी खराब या छोटी बडी नहीं होती । हर भाषा का अपना महत्व , स्थान और मान है , सबको बोलने पढने लिखने और समझने वाले लोग हैं इसलिए हर भाषा का सम्मान किया जाना चाहिए । सबसे जरूरी बात ये कि यदि आपको सम्मान करने से कोफ़्त है तो भी कोई बात नहीं किंतु किसी भाषा का अपमान नहीं किया जाना चाहिए । किंतु यहां ये प्रवृत्ति बहुत तेज़ी से पनप रही है कि किसी एक भाषा की दुम पकड के उसका गुणगान करते हुए दूसरी भाषा को तुच्छ ,घटिया, निम्न साबित किया जाए और सोचिए कि यदि वो भाषा खुद राष्ट्रभाषा हिंदी हो तो । जी हां , ठीक समझ रहे हैं आप , ऐसा लगता है मानो किसी ने खींच के एक चाटा मुंह पर लगा दिया हो । अफ़सोस और खीज़ तब ज्यादा होती है जब वो आपके अपने ही दायरे के हों , फ़ेसबुकिए , ब्लॉगर हों ......देखिए कैसे ,"







ये हमारे फ़ेसबुक और हिंदी ब्लॉगर मित्र डॉ.महफ़ूज़ अली जी के कुछ हालिया फ़ेसबुक अपडेट्स हैं जिन्हें पढ कर सच में दुख और अफ़सोस हुआ , आपको कैसा लगा ????

शुक्रवार, 29 जून 2012

ये एक चालीस का लोकल नहीं है ..........





.Twitter तो .एक चालीस का लोकल है सरबा ....एक कोमा का भी बढोत्तरी होते ही आपको ...कान के नीचे कट्टा लगा के कहेगा ....आप एक ठो कौमा फ़ालतू लगाए हैं ...आप चतुर नहीं है ..और ढेर चतुर बनिए :) । मन तो करता है कै बार कि कहें । काहे बे ई एक सौ चालीस का लिमिट कोन हिसाब से डिसाइड किए हो बे । फ़ेसबुक में ई लफ़डा नय है , इसलिए मित्र सखा दोस्त सब एक से एक अभिव्यक्ति देते हैं , बानगी देखिए






  • रामायण में कहा गया है कि जब भी आप अपने दूर के रिश्तेदार को अपने पास बुलाते हैं, तो उस जगह का नष्ट होना निश्चित है। उदाहराणर्थ - शकुनि



‎''इस देश पर मुस्लिमों ने कभी शाशन नहीं किया, शाशन करने वाले कुछ ख़ास खानदान थे, मुगलों के समय से लेकर आज तक शाशन करने वाला वर्ग असरफ, पठान, शेख खानदानों से ही आता रहा है, कभी मुस्लिम समाज के पिछड़े अर्जाल और अजलाफ समुदाय से लोगों को नेतृत्व में आगे लाने का प्रयास किसी राजनितिक दल ने नहीं किया. चाहे वह भाजपा हो, चाहे कांग्रेस या फिर लालू जी, मुलायम जी की पार्टी. जब नेतृत्व सौंपने की बात आती है तो वह असरफ और शेख के हिस्से ही जाती है. हमें सोचना होगा, यह क्यों है?''
शीबा असलम फहमी


भला उसकी नजर में बनना बेहतर है ... जो खुद भला हो ..... कमीनों की नजर में क्या भला बनना ..... खुदा की खैर है .... कि सारे कमीनों की नजर में भले हम नहीं ..... हा हा हा ..... टिचक्यूं


मैं खयाल हूं किसी और का, मुझे सोचता कोई और है | मैं करीब हूं किसी और के, मुझे जानता कोई और है... [ सलीम कौसर ]



कवि ने कविता की पहली पंक्ति का बिम्ब उठाकर दूसरी में धर दिया! पहली पंक्ति ने भागकर कवि के खिलाफ़ हेरा-फ़ेरी और उठाईगिरी की रिपोर्ट लिखा दी।



  • तीन दिन पहले इन्दौर में तीन लोगों ने ड्रग्स के नशे में, तीन साल की बच्ची के साथ दुष्कृत्य करने के बाद उसकी हत्या कर दी…

    अब भड़की हुई जनता उन तीनों दरिंदों के लिए फ़ाँसी की सजा माँग रहे हैं…

    लेकिन ऐसी माँग करने वालों को क्या पता कि यदि किसी तरह इन राक्षसों को फ़ाँसी की सजा हो भी जाए, तो "ऊपर" कोई न कोई "गाँधीवादी" रसोई वाली बाई मिल सकती है…


बैठे बैठे ज़िन्दगी बरबाद ना की जिए,
ज़िन्दगी मिलती है कुछकर दिखाने के लिए,
रोके अगर आसमान हमारे रस्ते को,
तो तैयार हो जाओ आसमान झुकाने के लिए |



  • बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लंपट परधन परदारा॥

    तुलसीदास जी ने उपरोक्त चौपाई चाहे जिस भी यु के लिए लिखा हो, किन्तु यह वर्तमान समय में चरितार्थ हो रहा है।


हालिया फिल्मों में "पान सिंह तोमर" और "कहानी" ने जिस प्रकार मस्तिष्क पर अपनी छाप छोडी है, काश कि अनुराग भी इतने सृजनशील होने के बावजूद ,छोड़ पाते..उन्ही की बनायीं "ब्लैक फ्राइडे" और "उड़ान" अभी भी जेहन में एकदम ताजा है..



कल नीरज जी ने एक बात अपने उद्बोधन में बहुत महत्वपूर्ण कही .....उन्होंने कहा कि हम तो तब की पैदाइश हैं जब देश आज़ाद नहीं था ...आजादी से पहले आदमी का इतना नैतिक पतन नहीं हुआ था ....जितना बाद में हुआ .......आज़ादी के बाद देश में राजनैतिक आंदोलन तो बहुत से हुए .....लेकिन सांस्कृतिक आंदोलन एक भी नहीं .......इस देश को सांस्कृतिक आंदोलन की जरूरत है .......:)))



मेरी ज़िंदगी के साज़ पर तेरी आवाज़ ही बजती रहे
हर सफर में हम हमक़दम, ये राह यूं गुजरती रहे...



बैसाखियाँ न ढूंढो चलने को ज़िंदगी में,
कदम उठाओ अपना, छोटा ही सही.
.....कैलाश शर्मा



मैं खुद से घबराता हुँ लिट्ल मैन , बेहद घबराता हुँ । क्योंकि हमसे मनुष्य जाति का भविष्य निर्भर करता है । मैं खुद से घबराता हुँ क्योँकि मैं इतना किसी चीज से नहीं भागते जितना कि स्वँय से । मैं रुग्न हुँ बहुत रुग्न लिट्ल मैन । इसमें हमारा दोष नहीं लेकिन इस रुग्नता को दुर करना हमारा दायित्व है । अगर हम दमन स्वीकार नहीं करते तो हम उत्पीड़कों से कभी दब नहीं सकते थे । काश हमें पता होता कि हमारे बिना उनका जीवन एक घँटा भी नहीं चल सकता है । हमारे मुक्तिदाता ने हमलोगों को सर्वहार वर्ग कहा , सताया हुआ कहा लेकिन उसने हमसे यह नहीं कहा कि हम अपने जीवन के लिए सिर्फ मैं ही जिम्मेवार हुँ । (एक लिट्ल मेन)



‎"कलम से जिरह"

आज मेरी कलम नाराज़ हो गयी मुझसे
बोली आज हड़ताल है
कुछ नहीं लिखूंगी

बस हम दोनों की जिरह शुरू....

"थक जाती हूँ मैं
तुम्हारे साथ घिसते घिसते
ज़िन्दगी के किस्से भी तो
अजीबोगरीब हैं
ऊटपटांग बेसिरपैर की बातें
कहते कहते
गला सूख जाता है मेरा

अरे वही रोज़मर्रा की चिकचिक
तुम भी ना नाज़
कुछ और शौक ना पाल लेतीं
गातीं, नाचतीं, पेंटिंग करती
जब देखो मुझे ही घिसती रहती हो

जो गुज़र रहा है, गुज़र चुका है
वही तो दर्ज करती हो
नया क्या है?
आत्माभिव्यक्ति के नाम पर
मुझ बेचारी पर रोज़ ये ज़ुल्म

तुम्हे शायद लगता होगा कि तुम
अपने ज़ख्मों पे मरहम लगा रही हो
पर नहीं जानती तुम
कितनों के ज़ख्म कुरेदे हैं तुमने
कितनी भूली बातें
जबरन लौटा लाती हो तुम
जिसे लोग जानबूझ कर अनदेखा करते हैं
तुम वही परोस देती हो उनके समक्ष"

कलम की कही में कुछ और ही दिखाई दिया
खुद को तो वो देख ही नहीं पा रही
अपनी क्षमता से अनभिज्ञ है

बेवकूफ
अपना महत्त्व नहीं जानती
जब किताब में उकेरे जायेंगे
इसके लिखे अक्षर
और हो जायेंगे सच में 'अ-क्षर'
तब समझेगी ये अपनी ताक़त
अपने जीवन का मोल

यूँ तो टेक्नोलोजी का ज़माना है
जब हार जाएगी लैपटॉप से दौड़ में
तब जानेगी शायद
मैं इससे कितना प्यार करती हूँ
क्यूँ रोज़ इसकी गर्दन
फँसी रहती है मेरी उँगलियों में

और ये बस मैं ही जानती हूँ
मैं इसका साथ कभी नहीं छोडूंगी
विराम भले ही दे दूं इसे
कुछ समय को
थक गयी है ना बहुत

*naaz*




नूरे इस्लाम ने समझा था मुनासिब पर्दा,
शमा-ए-ख़ामोश को फ़ानूस की हाजत क्या है.



आँगन आँगन देव विराजे, आँगन आँगन भाव-भजन हैं
फिर जात-धर्म के मसलों पर, क्यूँ हम सब गूंगे-बहरे हैं ?


फेसबुक की दीवारों से अपने दुखों-चिंताओं का माथा न फोड़ें...दीवारें और भी हैं...



ईशा देओल ने शादी कर ली है...

भारतीय सिनेमा में उनका यह अमूल्य 'योगदान' हमेशा याद किया जाएगा !




बिखरने से डरता था

वह

सो

हँसता नहीं था!

मंगलवार, 26 जून 2012

फ़ेसबुक पर होती बातें


आइए देखें कि आज दोस्त/मित्र अपनी फ़ेसबुक यानि मुखपुस्तक पर क्या लिख बांच रहे हैं ...........>>>>>

क्या अब मुँह खोलेंगे P.M.!!


  • भारत का अबू हमज़ा सीमा पार जा पाक के आंतकियों को जब हिंदी सीखाता है तो क्या हम इसे दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान मान सकते हैं।



गैंग्स आफ डिसबैलेन्सपुर

बड़ी मुश्किल से खुद को “गैंग्स आफ वासेपुर” का रिव्यू लिखने से रोक पा रहा हूं। अब औचित्य नहीं है। अनुराग कश्यप चलती का नाम गाड़ी हो चुके हैं। स्पान्सर्ड रिव्यूज का पहाड़ लग चुका है। वे अब आराम से किसी भी दिशा में हाथ उठाकर कह सकते हैं- इतने सारे लोग बेवकूफ हैं क्या? फिर भी इतना कहूंगा कि दर्शकों को चौंकाने के चक्कर में कहानी का तियापांचा हो गया है।

धांय-धांय, गालियों, छिनारा, विहैवरियल डिटेल्स, लाइटिंग, एडिटिंग के उस पार देखने वालों को यह जरूर खटकेगा कि सरदार खान (लीड कैरेक्टर: मनोज बाजपेयी) की फिल्म में औकात क्या है। उसका दुश्मन रामाधीर सिंह कई कोयला खदानों का लीजहोल्डर है, बेटा विधायक है, खुद मंत्री है। सरदार खान का कुल तीन लोगों का गिरोह है, हत्या और संभोग उसके दो ही जुनून हैं। उसकी राजनीति, प्रशासन, जुडिशियरी, जेल में न कोई पैठ है न दिलचस्पी है। वह सभासद भी नहीं होना चाहता न अपने लड़कों में से ही किसी को बनाना चाहता है। उसका कैरेक्टर बैलट (मतिमंद) टाइप गुंडे से आगे नहीं विकसित हो पाया है जो यूपी बिहार में साल-दो साल जिला हिलाते हैं फिर टपका दिए जाते हैं। होना तो यह चाहिए था कि रामाधीर सिंह उसे एक पुड़िया हिरोईन में गिरफ्तार कराता, फिर जिन्दगी भर जेल में सड़ाता। लेकिन यहां सरदार के बम, तमंचे और शिश्न के आगे सारा सिस्टम ही पनाह मांग गया है। यह बहुत बड़ा झोल है।

कहानी के साथ संगति न बैठने के कारण ऊमनिया समेत लगभग सारे गाने बेकार चले गए हैं। ‘बिहार के लाला’ सरदार खान के मरते वक्त बजता है। गोलियों से छलनी सरदार भ्रम, सदमे, प्रतिशोध और किसी तरह बच जाने की इच्छा के बीच मर रहा है। उस वक्त का जो म्यूजिक है वह बालगीतों सा मजाकिया है और गाने का भाव है कि बिहार के लाला नाच-गा कर लोगों का जी बहलाने के बाद अब विदा ले रहे हैं। इतने दार्शनिक भाव से एक अपराधी की मौत को देखने का जिगरा किसका है, अगर किसी का है तो वह पूरी फिल्म में कहीं दिखाई क्यों नहीं देता



बिगरी बात बने नहीं लाख करे किन कोय।
रहिमन बिगरे दूध को मथे न माखन होय॥



सेबेस्तियो सल्गादों की इस तस्वीर के साथ दुनिया भर के मेहनतकश मजदूरों को मेरा सलाम ,मुमकिन हो तो प्रार्थना के स्वर बदल दीजिए ,हमारी प्रार्थना जय मेहनतकश ,जय मजदूर होनी चाहिए |आइये इस तस्वीर के साथ पढ़ें नरेश अग्रवाल की ये कविता

अभी सूरज भी नहीं निकला होगा
और तुम जा जाओगे

तुम्हारे जागते ही
जाग जायेंगे
ये पेड़-पक्षी और
धूलभरे रास्ते

तुम हॅंसते हुए
काम पर बढ़ोगे
और देखते ही देखते
यह हॅंसी फैल जायेगी
ईंट- रेत और सीमेंट की बोरियों पर
जिस पर बैठकर
हॅंस रहा होगा तुम्हारा मालिक

वह थमा देगा तुम्हारे हाथों में
कुदाल, फावड़े और बेलचे
बस शुरू हो जायेगी
तुम्हारी आज की लड़ाई

इस लड़ाई में
खून नहीं पसीना गिरेगा
जिसे सोखती जायेगी धरती
एक रूमाल बनकर बार-बार
जीत होगी दो मुट्ठी चावल

एक थकी हुई शाम
घर लौटने का सुख
और बच्चों की याद

बच्चे कभी नहीं पूछेंगे
तुम कौन सा काम करते हो
वे समझ जायेंगे
तुम्हारी झोली देखकर

हमेशा की तरह
तुम आज भी
हार कर लौटे हो ।


बड़का बड़का लीडर लोग "ते सब हंसे मष्ट करि रहहू" की मुद्रा में जमे हैं। बेचारे वीरभद्र सिंह को तो त्यागपत्र देना पड़ रहा है!


हर तरफ हर जगह बे शुमार आदमी
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी

तन्हाइयाँ कई तरह की हैं

आखिरकार पत्नी समेत वीरभद्र पर भ्रष्टाचार का आरोप हो गया तय ,
जय हो , कांग्रेस की सरकार में करप्शन का खूब बना रहता है लय ,

आउर जुलुम तो ई देखिए कि , भारत निरमान भी होता रहता है एकदम्मे से



सुनो मुक्तिबोध, यहां सब 'अंधेरे में' हैं...


‎"पति " शब्द ....मेरे विचार से उचित नहीं ....मालिक होने का भ्रम पैदा कर देता है ....पतिव्रता होना .....गुलामी ...या वफादारी का सर्टिफिकेट है .....

व्रत तो एक ही उत्तम है .......सत्य का अनुगमन करने का ....अगर सत्य को जीवन मे उतरने दिया जाय ..फिर किसी स्वांग की जरूरत भी नहीं ......और जब सभी सत्य पर होंगे तो सत्य हारेगा किससे ?..सत्य मेव जयते ही रहेगा ...बेकार के तमाम आडम्बर अपने आप स्वाहा हो जायेंगे ....

मैं पति की बजाय साथी कहलाना ज्यादा पसंद करूँगा ...वाकई मे कोई किसी का मालिक कैसे हो सकता है ...जब सभी का मालिक एक है ....

अपनी पत्नी के लिये भी जीवन-साथी शब्द का इस्तेमाल ही ज्यादा श्रेयस्कर है ....इसी बात पर एक गीत याद आया ....
"जीवन साथी हैं .....दिया और बाती हैं ...."कोई मेरा मित्र ढूंढ कर इस गीत को यहाँ पोस्ट भी कर देगा ...ऐसा मेरा विश्वास है .....नमस्कार मित्रों !!!


चिलचिलाती धूप में अक्सर कुछ लोगों को नाक से खून बहने की शिकायत होती है। इसे नकसीर भी कहा जाता है। यह मौसम के अनुसार शरीर में अधिक गर्मी बढ़ने से भी हो सकता है और कुछ लोगों को अधिक गर्म पदार्थ का सेवन करने से भी होती है।




पन्नों को महकने के लिये शब्दों का इत्र तो चाहिये
जीवन को चहकने के लिये मोहब्बत का कलरव तो चाहिये
ये अजब पर्दानशीनी है तेरे मेरे बीच या रब
तुझसे मिलन के लिये एक कसक तो कसकनी चाहिये


  • आखिर सोनिया और मुलायम के बीच ऐसी क्‍या सीक्रेट डील हुई है, जिसके कारण मुलायम ने ममता का साथ छोड़ दिया... क्या फिर से सीबीआई का दुरूपयोग तो नहीं होने वाला था? या फिर और कोई कारण है....



चहूँ ओर ... अस्त-व्यस्त
जनता त्रस्त
मंत्री-अफसर मस्त
सत्ताधारी मदमस्त
और लोकतंत्र हुआ है पस्त
कब होगा 'उदय' -
इन भ्रष्टों का सूरज अस्त ?


बचपन में एक कहावत पढ़ी थी ये आज भी उतनी ही सही यानि सोलह आने सच है - लोग अपने दुखों/परेशानियों से उतने दुखी नहीं हैं जितना दूसरों के सुख/तरक्की देखकर उन्हें खुजली होती है, या दूसरे शब्दों में (सरल भाषा में) कहें तो परेशानी होती है।



तुम्हारी करवटों की सलवटें हम तक पहुँच गई
सिसकिया हमारी उमड़ी और अम्बर से बरस गई ...सोनल