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इस देश में हिंदी को गरियाने , धकियाने , धमकाने वाले लोगों को तलाशने के लिए आपको ज्यादा मेहनत नहीं करनी पडती है । न ही ऐसा है कि वे किसी अहिन्दी भाषी प्रदेश या देश से आते हैं , न न न न वे अंग्रेज , ब्रिटिश , फ़्रांसीसी आदि भी नहीं हैं , वे आपके हमारे बीच के अपने हमारे मित्र/सखा /दोस्त और परिचित ही हैं । भाषा साहित्य कोई भी बुरी खराब या छोटी बडी नहीं होती । हर भाषा का अपना महत्व , स्थान और मान है , सबको बोलने पढने लिखने और समझने वाले लोग हैं इसलिए हर भाषा का सम्मान किया जाना चाहिए । सबसे जरूरी बात ये कि यदि आपको सम्मान करने से कोफ़्त है तो भी कोई बात नहीं किंतु किसी भाषा का अपमान नहीं किया जाना चाहिए । किंतु यहां ये प्रवृत्ति बहुत तेज़ी से पनप रही है कि किसी एक भाषा की दुम पकड के उसका गुणगान करते हुए दूसरी भाषा को तुच्छ ,घटिया, निम्न साबित किया जाए और सोचिए कि यदि वो भाषा खुद राष्ट्रभाषा हिंदी हो तो । जी हां , ठीक समझ रहे हैं आप , ऐसा लगता है मानो किसी ने खींच के एक चाटा मुंह पर लगा दिया हो । अफ़सोस और खीज़ तब ज्यादा होती है जब वो आपके अपने ही दायरे के हों , फ़ेसबुकिए , ब्लॉगर हों ......देखिए कैसे ,"
अभी जब प्लेन में था तो लैपटॉप पर अपना ही हिंदी का ब्लॉग खोल लिया.. आस पास के लोग बड़ी हिकारत भरी नज़र से देखने लगे... तब पता चला कि हिंदी सिर्फ गरीबों और क्लासलेस की ही भाषा है... क्लास तो इंग्लिश में ही है.. सबसे बड़ी बात हिन्दुस्तानी ही हिकारत से देख रहे थे.. और कुछ तो सरप्राइज़ कर रहे थे कि कंप्यूटर हिंदी भी जानता है.. अजीब हाल है.. हिंदी का हाल उस प्रौसटीट्युट की तरह है जिसे पाना तो सब चाहते हैं लेकिन अपनाना कोई नहीं.. हुह... !!!
मुझे जब भी हिंदी के लेखक की इमेज ध्यान में आती है तो एक भिखारी की इमेज भी साथ ही साथ बन जाती है. "तेरे बच्चे जियें.. अल्लाह के नाम पे दे दे बावा" चाहे वो कितना भी प्रतिष्ठित क्यूँ न हो ... शायद मैं खुद से कॉम्पिटिशन करने लगता हूँ.. सुपीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स भी बहुत खराब होती है.... या फिर मैं पागल हो गया हूँ... हिंदी लेखन में लौबिसटों का ख़ात्मा होना ज़रूरी है.. जब तक के लौबींग नहीं ख़त्म होगी तब तक के ऐसे ही ख़याल आयेंगे.. मेरे यह भी नहीं समझ आता है कि लोग हिंदी लेखन क्यूँ अपनी बेईज्ज़ती कराने के लिए करते हैं? ना कोई नाम.. ना दाम.. जस्ट एन्जॉय योरसेल्फ...ओनली.
जिनकी बीवियां घर में गहनों के लिए तरसतीं हैं... जिनके बीवियों के साड़ी का रंग और पेटीकोट का रंग अलग होता है जिन्हें पैर के अंगूठे से छुपाया जाता है... और जिनकी बीवियां सेक्सुअली मोहल्ले के जवान लड़कों के ऊपर डिपेंडेंट होतीं हैं... और जो दूसरों पर पैरा साईट की तरह ज़िन्दगी गुज़ारते हैं.. वो घर के बाहर हिंदी में साहित्यकार का पुरुस्कार बांटते हैं.... वाह! रे.. हाईट्स ऑफ़ डुअलटी...
जुलाई 2006 में कादम्बिनी में मेरी एक कविता छपी थी जिसका रेम्युनरेशन 200 रुपये का चेक आया था. जिसे मैंने कैश न करा कर संभाल कर रख दिया था. बात दो सौ रुपये की नहीं है बात उस इज्ज़त की है जो कादम्बिनी ने दी. आज कोई कागज़ खोजते हुए यह चेक मिला. मुझे आज तक जितने भी चेक पत्रिकाओं से मिले हैं.. उन्हें मैंने कभी कैश नहीं कराया. ना ही कभी अपने अडोस-पड़ोस में किसी को दिखाया. लोग मज़ाक उड़ाते. पिछले पंद्रह सालों में अब तक जितने भी चेक मुझे मिले हैं सब ऐसे ही संभाल कर रखे हैं... क्यूंकि जो अमाउंट टोटल में बनती है वो ऐसा लगता है कि मेरा ही मज़ाक उड़ा रही है. मुझे क्लास बहुत पसंद है जिस तरह लौरेटो, ला-मार्टिनियर, कार्मल,के.वी., और नैनीताल/शिमला के स्कूलों में पढ़ी लड़कियों का एक क्लास होता है उसी तरह की क्लास पत्रिकाओं में ही छपना पसंद करता हूँ. और जितनी भी क्लास पत्रिकाएं हैं वो पैसा नहीं देतीं. अजीब अजीब पत्रिकाओं और अखबारों में तो मेरा जैंगो (माय लवली डौगी) भी कविता कर के छपता था. कुछ भी कहो अंग्रेज़ी में कम अज़ कम क्लास तो है और पैसा भी डॉलर्स ($) में. अब तो मैं हिंदी में लिख कर हिंदी पर एहसान करता हूँ..
ये हमारे फ़ेसबुक और हिंदी ब्लॉगर मित्र डॉ.महफ़ूज़ अली जी के कुछ हालिया फ़ेसबुक अपडेट्स हैं जिन्हें पढ कर सच में दुख और अफ़सोस हुआ , आपको कैसा लगा ????