याद है स्कूल के वे दिन...चार कम्पार्टमेंट वाला वो स्टील का डिब्बा...जिसके हर हिस्से से प्यार टपकता था...वो दिन जब स्कूल ना जाने के हमारे पास हजार बहाने होते थे और कमाल की बात है एक भी काम नहीं आते थे...
उ उन मम्मी पेट दर्द कर रहा हैं.
हूँ. कोई बात नहीं बेटा अभी ठीक हो जायेगा.
मम्मी आज स्कूल नहीं जाना. सच्ची में बड़े जोरों से पेट दर्द कर रहा है.
मम्मी मुस्कुराते हूवे- ओह स्कूल नहीं जाना इसलिए पेट दर्द कर रहा है ना. बेटा जी अभी तो खेल रहे थे तो पेट दर्द नहीं कर रहा था. अब स्कूल जाना है तो पेट दर्द. अच्छा चलो तुम्हारा पेट सहला देते हैं अभी ठीक हो जायेगा.
पैर पटकते हूवे- नहीं मम्मी नहीं जाना स्कूल ...
मम्मी के पास उसकी भी दवा. पैर पटकते रह गए हम और मम्मी सहला के धमका के फुसला के - आज चलो टिफिन में तुम्हारी पसंद की ये डिस देंगे वो डिस बना के डाल देती हूँ. चलो अच्छे बेटा अब तंग मत करो तैयार हो जावो वरना अब पिट जावोगे. अपन बुल्के टपकते हूवे तैयार होके चल देते थे.
कभी वो बनाती थी जब हमारी पसंद के पराठे....और कभी कभी उसमें होता था. पराठों के साथ नानी या दादी के हाथों के बने आचार भी.
याद ही होगा ना भी याद हो तो शाम को जब कहीं से पूरी तरह थके घर से दूर किसी महानगर के अपने किसी तरह पैर फैला भर की जगह रखने वाले कमरे में पैर रखते हैं और खाने बनाने की हिम्मत नहीं होती तब वो दिन जरुर याद आ ही जाते हैं.
स्टेनली जिसकी माँ नहीं है जो उसे टिफिन तैयार करके दे सके. स्टेनली के दोस्त जो अपनी टिफिन का खाना उसे साथ शेयर करते हैं. स्टेनली अपने फ्रेंड्स की माँओं के हाथ का बना खाना खाते हूवे शायद थोडा थोडा अपने हिस्से की माँ का खाना शायद खा रहा होता है. एक टिचर जिसमें स्टेनली शायद अपनी मम्मी को ढूंढता रहता है. एक खडूस टिचर या कहें खाने की मशीन जो लंच ब्रेक में बच्चों का खाना खुद हजम कर जाता है. बच्चे उसे खिलाना नहीं चाहते वे अपनी टिफिन स्टेनली के साथ बाँटते हैं भुक्खड़ टिचर को ये पसंद नहीं उसे लगता है. जैसे उसके हिस्से का ही खाना कोई चोरी से खा जाता हो.
स्टेनली को एक चेतावनी टिफिन नहीं तो स्कूल नहीं और स्टेनली स्कूल से गायब और फिर एक रोज जब लौटता है स्टेनली अपने डब्बे के साथ. स्टेनली का डिब्बा सबसे पहले खोलता है उसी भुक्खड़ और खडूस टिचर के सामने तो टिचर उससे नज़रे नहीं मिला पाता और स्कूल छोड़ कर कहीं और चला जाता है. स्टेनली का डिब्बा अब सबके लिए खुला है अपने दोस्तों के साथ साथ टीचरों के लिए अब स्टेनली खुद खाता कम दूसरों को खिलाने में अब वो मस्त है. स्टोरी का दी एंड है ये लेकिन वो खडूस टिचर बार - बार याद आता है उससे लाख नफरत होने के बावजूद.
लाइफ बहुत सिम्पल है, गोल गोल मत बोल
जल्दी से इसको चख ले, चटकारे ले के डोल
(नोट- फिल्म 'स्टेनली का डिब्बा'में कुछ कमिय भी हैं. लेकिन इस फिल्म को देखने बाद उन कमियों को गिनाने का मूड नहीं है. अमोल गुप्ते कमाल के डायरेक्टर,स्क्रिप्ट राईटर और एक्टर. दिब्या दत्ता - ये पहली वो ऐक्ट्रेस हैं जिन्सको किसी भी फिल्म में देखने के बाद किसी भी भूमिका में सिर्फ मैने चार चाँद ही लगाते देखा है.हर बार वे हैरान कर जाती हैं अपने अभिनय से.)
- अंजुले

लिव-इन रिलेशनशिप पर आपकी क्या राय है ??? गंभीर वार्ता करें, स्वागत है..बेकार के और किसी पर किये गए निजी कमेंट्स डिलीट कर दिए जायेंगे...

जब भी मुझे दर्द कोई मिलता है,
उसी के ग़म में इसे भी शुमार करता हूँ !

ज़िन्दगी जीने के दो तरीके होते है!
पहला: जो पसंद है उसे हासिल करना सीख लो!
दूसरा: जो हासिल है उसे पसंद करना सीख लो!

मुझे ,फ़ूल , पौधों ,पेडों से बहुत प्यार है , घर में फ़िलहाल फ़िर से कम से कम बाईस गमलों में फ़ूल और पत्तियां मुस्करा रही हैं , कमाल है कि पुत्र को भी ये सब खूब पसंद हैं । सो अब उन्हीं की फ़रमाईश और बहुत समय बाद , एक बार फ़िर से गमलों में टमाटर , मिर्च , नींबू के पौधों और तोरी , करेला आदि की बेलों को लगाने की तैयारी चल रही है , संडे की गुडमॉर्निंग ड्यूटी यहीं से शुरू होती है

इन आँखो को एक ख्वाब दिखा दिया आपने ,
हमे जिन्दगी तो दी थी किसी और ने ,
पर बेपनाह प्यार देकर जीना सीखा दिया आपने ।