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सोमवार, 4 जुलाई 2011

देखें कि , कुछ चेहरों ने क्या की है गुफ़्तगू ----happy facebooking




कल ही शिवम मिश्रा जी ने शिकायत की , कि इस ब्लॉग पर पोस्टें क्यों नहीं आ रही हैं , यही शिकायत मित्र संतोष त्रिवेदी जी भी कर चुके हैं। मैंने जब इस ब्लॉग को बनाया था तो योजना भी यही थी कि रोज़ फ़ेसबुक मित्रों में से  चुनिंदा के स्टेटस अपडेट को यहां ब्लॉगजगत तक पहुंचाऊंगा । चलिए अब ये कोशिश की जाएगी ।



  • जनविरोधी छवि साफसुथरी करने के लिए इस्तेमाल करें:

    मीडिया छाप न्यू धुलाई का साबुन!!!

    खूब झाग उठाये-जनता की आँख जलाये!!!

    -दाम में कम, काम में दम-


  • खुश हुए देखकर जिनको, वो हाफ़ लाईन हो गए।
    नेट बंद क्या हुआ मुआ, वो ऑफ़ लाईन हो गए॥
     

    फेसबुक आने के बाद विरही-विरहिणियों की संख्या बढ़ी है या घटी है ? विरह का प्रसार हुआ है या अवसान हुआ है ?

    महबूब वो कि सर से क़दम तक ख़ुलूस हो
    आशिक़ वही जो इश्क़ से कुछ बदगुमाँ भी हो- फिराक गोरखपुरी
     

    ‎"यहाँ मजदुर को मरने की जल्दी कुछ यूँ भी है
    जिंदगी की कशमकश में कफ़न महंगा न हो जाए.."
    via Abhishek
    सुना कई बार इसलिए ही टाल दिया मरना ,
    बरसात में सूखी लकडियां ,बहुत कीमत में बिकती हैं
    via अजय कुमार झा
     

    याद है स्कूल के वे दिन...चार कम्पार्टमेंट वाला वो स्टील का डिब्बा...जिसके हर हिस्से से प्यार टपकता था...वो दिन जब स्कूल ना जाने के हमारे पास हजार बहाने होते थे और कमाल की बात है एक भी काम नहीं आते थे...

    उ उन मम्मी पेट दर्द कर रहा हैं.
    हूँ. कोई बात नहीं बेटा अभी ठीक हो जायेगा.
    मम्मी आज स्कूल नहीं जाना. सच्ची में बड़े जोरों से पेट दर्द कर रहा है.

    मम्मी मुस्कुराते हूवे- ओह स्कूल नहीं जाना इसलिए पेट दर्द कर रहा है ना. बेटा जी अभी तो खेल रहे थे तो पेट दर्द नहीं कर रहा था. अब स्कूल जाना है तो पेट दर्द. अच्छा चलो तुम्हारा पेट सहला देते हैं अभी ठीक हो जायेगा.
    पैर पटकते हूवे- नहीं मम्मी नहीं जाना स्कूल ...

    मम्मी के पास उसकी भी दवा. पैर पटकते रह गए हम और मम्मी सहला के धमका के फुसला के - आज चलो टिफिन में तुम्हारी पसंद की ये डिस देंगे वो डिस बना के डाल देती हूँ. चलो अच्छे बेटा अब तंग मत करो तैयार हो जावो वरना अब पिट जावोगे. अपन बुल्के टपकते हूवे तैयार होके चल देते थे.
    कभी वो बनाती थी जब हमारी पसंद के पराठे....और कभी कभी उसमें होता था. पराठों के साथ नानी या दादी के हाथों के बने आचार भी.

    याद ही होगा ना भी याद हो तो शाम को जब कहीं से पूरी तरह थके घर से दूर किसी महानगर के अपने किसी तरह पैर फैला भर की जगह रखने वाले कमरे में पैर रखते हैं और खाने बनाने की हिम्मत नहीं होती तब वो दिन जरुर याद आ ही जाते हैं.

    स्टेनली जिसकी माँ नहीं है जो उसे टिफिन तैयार करके दे सके. स्टेनली के दोस्त जो अपनी टिफिन का खाना उसे साथ शेयर करते हैं. स्टेनली अपने फ्रेंड्स की माँओं के हाथ का बना खाना खाते हूवे शायद थोडा थोडा अपने हिस्से की माँ का खाना शायद खा रहा होता है. एक टिचर जिसमें स्टेनली शायद अपनी मम्मी को ढूंढता रहता है. एक खडूस टिचर या कहें खाने की मशीन जो लंच ब्रेक में बच्चों का खाना खुद हजम कर जाता है. बच्चे उसे खिलाना नहीं चाहते वे अपनी टिफिन स्टेनली के साथ बाँटते हैं भुक्खड़ टिचर को ये पसंद नहीं उसे लगता है. जैसे उसके हिस्से का ही खाना कोई चोरी से खा जाता हो.

    स्टेनली को एक चेतावनी टिफिन नहीं तो स्कूल नहीं और स्टेनली स्कूल से गायब और फिर एक रोज जब लौटता है स्टेनली अपने डब्बे के साथ. स्टेनली का डिब्बा सबसे पहले खोलता है उसी भुक्खड़ और खडूस टिचर के सामने तो टिचर उससे नज़रे नहीं मिला पाता और स्कूल छोड़ कर कहीं और चला जाता है. स्टेनली का डिब्बा अब सबके लिए खुला है अपने दोस्तों के साथ साथ टीचरों के लिए अब स्टेनली खुद खाता कम दूसरों को खिलाने में अब वो मस्त है. स्टोरी का दी एंड है ये लेकिन वो खडूस टिचर बार - बार याद आता है उससे लाख नफरत होने के बावजूद.

    लाइफ बहुत सिम्पल है, गोल गोल मत बोल
    जल्दी से इसको चख ले, चटकारे ले के डोल

    (नोट- फिल्म 'स्टेनली का डिब्बा'में कुछ कमिय भी हैं. लेकिन इस फिल्म को देखने बाद उन कमियों को गिनाने का मूड नहीं है. अमोल गुप्ते कमाल के डायरेक्टर,स्क्रिप्ट राईटर और एक्टर. दिब्या दत्ता - ये पहली वो ऐक्ट्रेस हैं जिन्सको किसी भी फिल्म में देखने के बाद किसी भी भूमिका में सिर्फ मैने चार चाँद ही लगाते देखा है.हर बार वे हैरान कर जाती हैं अपने अभिनय से.)
    - अंजुले
     

    • लिव-इन रिलेशनशिप पर आपकी क्या राय है ??? गंभीर वार्ता करें, स्वागत है..बेकार के और किसी पर किये गए निजी कमेंट्स डिलीट कर दिए जायेंगे...
     
     
    • ज़िन्दगी जीने के दो तरीके होते है!
      पहला: जो पसंद है उसे हासिल करना सीख लो!
      दूसरा: जो हासिल है उसे पसंद करना सीख लो!
      • मुझे ,फ़ूल , पौधों ,पेडों से बहुत प्यार है , घर में फ़िलहाल फ़िर से कम से कम बाईस गमलों में फ़ूल और पत्तियां मुस्करा रही हैं , कमाल है कि पुत्र को भी ये सब खूब पसंद हैं । सो अब उन्हीं की फ़रमाईश और बहुत समय बाद , एक बार फ़िर से गमलों में टमाटर , मिर्च , नींबू के पौधों और तोरी , करेला आदि की बेलों को लगाने की तैयारी चल रही है , संडे की गुडमॉर्निंग ड्यूटी यहीं से शुरू होती है
       

      इन आँखो को एक ख्वाब दिखा दिया आपने ,
      हमे जिन्दगी तो दी थी किसी और ने ,
      पर बेपनाह प्यार देकर जीना सीखा दिया आपने ।
     
    • उठौने के दूध का भाव 1 जुलाई से 2 रूपए प्रति लीटर बढ़ गया है मेरे यहां मुंबई में। अब बढ़े दर की सिर्फ सूचना दी जाती है। कोई मोल-मोलाई नहीं। 34 रूपए प्रति लीटर हो गया। आप के यहां क्‍या भाव है? शहर और दर लिखें।
       
       आज के लिए इतना ही , चलिए कल से आप यहां पर नियमित रूप से कुछ चेहरों की किताबों पर लिखे हर्फ़ पढ पाएंगे ।

गुरुवार, 9 जून 2011

ये चेहरे तो बगावत पे उतर आते हैं ..happy facebooking






  • इन दिनों फ़ेसबुक पर तेज़ी से बदलते घटनाक्रमों पर लोग अपनी बात रख रहे हैं , लिख रहे हैं , बहस कर रहे हैं और एक पूरी ज़मात तो बगावत पर उतर आई है । देखिए न वे बगावती चेहरे क्या कैसे कह रहे हैं ??







    • क्या आर.एस.एस. और बी.जे.पी. को भ्रष्टाचार पर बोलने का अधिकार नहीं है?





    • सुनील कुमार को जिन पत्रकारों ने बेरहमी से पीटा है,हम चाहते हैं कि हमारे पत्रकार साथी उनके नाम हम तक पहुंचाएं। हम उनके खिलाफ एफआइआर दर्ज कराने की मांग करना चाहते हैं। सुनील कुमार ने जूते दिखाए तो उन पर दर्जनों केस लाद दिए गए और जिन पत्रकारों ने जमकर पीटा,वो मसीहा बनकर घूम रहे हैं,ऐसा कैसे चलेगा?







    • आज स्टार न्यूज़ पर दिग्विजय सिंह बाबा रामदेव को बड़ी इज्जत बख्स रहे हैं. रामदेव कहते - कहते अब बाबा रामदेव कह रहे हैं. भाषाई मर्यादा में बात कर रहे हैं. विश्वास ही नहीं हो रहा कि ये यही दिग्विजय सिंह है. असली कॉंग्रेसी नेता हैं.






    • भारत सरकार ने शर्त रखी है कि "लोक-पल बिल" के लिए, कम से कम 25 करोड़ लोगों का समर्थन होना अनिवार्य है....आप सब से अनुरोध है, कि ऊपर दिए गए नंबर पर कॉल करें (नि:शुल्क), और अपना समर्थन दें, यह सिर्फ मिस कॉल होगी...मैंने कॉल कर दी है, अब आपकी बारी है....












    • जूतम-पैजार के इस माहौल में मुझे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी कि लिखी यह कविता बहुत याद आ रही है..

      जूता
      ----
      उसने कहा-
      मेरे जूते की पालिश में
      तुम अपना चेहरा देख सकते हो।
      मैंने तिलमिलाकर सोचा
      वे लोग खुशनसीब हैं
      जिनके चेहरे नहीं हैं।
      फिर ख्याल आया
      नहीं वे लोग भले आदमी हैं
      जो जूते नहीं पहनते।










    • जिस दिन सत्ता से दूर हो जाओ गे और आम आदमी बनोगे उस दिन ये जनता तुम्हे गल्ली में और दिल्ली में .. जूतों से मारेगी ये बात तो तय है 




    • और अब कुछ अपनी बातें 









    • आज देश को कुछ लोगों ने बारूद के ढेर पर बिठा दिया है , और वो सोच रहे हैं कि विस्फ़ोट की आग से उन्हें सियासत बचा सकेगी शायद वे भूल रहे हैं कि आग की तपिश , ऊपर नीचे का फ़र्क नहीं किया करती








    • चिंगारी सुलग चुकी है और इसे हवा देने वाले भी अपना काम बखूबी कर रहे हैं अब हमारा ये कर्तव्य बनता है कि उनका पुरज़ोर समर्थन इस रूप में करें कि वो सरकार और उससे जुडे हर भ्रष्टाचार के खिलाफ़ इतनी मजबूती से खडे हो सकें कि न सिर्फ़ भ्रष्टाचार बल्कि सरकार भी तिनके की तरह उड जाए , मैं हर मोर्चे , हर मोड और हर मुद्दे पर उनके साथ खडा हूं ..और आप








    • अब समय आ गया है कि नेताओं/मंत्रियों को टीवी स्टूडियोज़ से बाहर निकल कर आम जनता के सामने आकर अपनी बात कहने , बहस करने , और आम लोगों के प्रश्नों का उत्तर देने के लिए बाध्य किया जाए , खुली बहस हो , विमर्श हो







    • ‎16 अगस्त के बाद तो जो होगा वो होगा ही , लेकिन ये बहुत जरूरी हो जाता है कि , तब तक इस चिंगारी को अब बुझने न दिया जाए और हो सके तो इसे हवा देने का एक भी मौका न गंवाया जाए ...मैं खुद सोच रहा हूं कि बहुत जल्द अंतर्जालिक मित्रों को एक बार आपस में मिलने का मौका दिया जाए , ताकि सब ट्विट्टरिए , फ़ेसबुकिए , और ब्लॉगर्स ..एक शक्तिशाली स्तंभ के रूप में सामने आकर ,चुनौती की तरह सरकार को चुभ सके


























गुरुवार, 2 जून 2011

देखें तुम्हारा चेहरा क्या कहता है ...हैप्पी फ़ेसबुकिंग






ललित जी , एक सजग सचेत ब्लॉगर हैं , सत्ता और सरकार के गलियारों में चल रही उठापटक से रूबरू रहते हैं , आज हुकूमत की नई पाबंदियों पर कुछ कह रहे हैं देखिए क्या

सूचना प्रौद्योगिकी क़ानून २००८ में चोरी-चोरी चुपके -चुपके किया गया यह बदलाव हमे छत्तीस साल पहले इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार द्वारा लागू किए गए आपातकाल की याद दिलाता है ,लेकिन आपातकाल हटते ही उन दिनों की इंदिरा कांग्रेस का क्या हश्र हुआ था ,यह आज की सोनिया कांग्रेस को अच्छी तरह याद तो रहना चाहिए . अप्रिय इतिहास ने खुद को दोहराया है , उस वक्त की सत्ता ने कुछ न कुछ ज़रूर खोया है.



ओह ...90 में सिर्फ ४ परसेंट कम मिले १० वी में.. ८६ % मिले है दोस्तों , कोई बात नहीं यार ८६ तो ८६ मै तो खुश हु ..आप मेरी ख़ुशी में शामिल है की नहीं ? मै तो ये मिठाई लेकर आया हु , आप सबके आशीर्वाद से ही मुझे ये सफलता मिली जो है आओ और मुंह मीठा तो करो यारो ...:)))))))))))))))))))))))
 

या तो बाबा रामदेव और अन्ना हजारे जैसे मार्ग दर्शकों को सपोर्ट करिये या फिर कोई वैकल्पिक रास्ता चुनते हुए देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाइये .. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में न्यायाधीश बन कर अन्ना या रामदेव बाबा का मूल्यांकन करने की ज़रूरत नहीं है... ज़रूरत है सिपाही बन कर लड़ने की... बलिदानी की तरह आहुति देने की...

शीर्ष कलश की चमक बरकरार रखनी है तो नींव का पत्थर भी बनना ही होगा
 
 
आंदोलन करना स्वामी रामदेव का काम नहीं - शाहरूख खां.
बाबा रामदेव योग सिखाते हैं योग ही सिखाएं तो बेहतर - दिग्विजय सिंह
मेरा सवाल है,आंदोलन करना किसका काम है? नेता, समाजसेवी या फिर कौन? यदि ऐसा है तो अबतक कितने आंदोलन हुए. नहीं हुए तो क्यों
 

वो कहते है की उनके काबिल नहीं हूँ मैं,मेरे ना होने की कमी तो उनसे पूछो जिनको हांसिल नहीं हूँ मैं..!!
 

काले धन की कालिमा किसको पसंद है, कौन चाहता है इसका वरण करना, जल्‍दी से नाम लिखें
 

बाबा रामदेव भगवा पहनते हैं, सभाओं में वन्देमातरम के नारे लगवाते हैं, भारत स्वाभिमान संगठन के झण्डे में "ओ3म" का निशान है - क्या इतने कारण पर्याप्त नहीं हैं दिग्विजय सिंह, लालू यादव इत्यादि को "सुलगने" के लिये?
अतः बाबा रामदेव समर्थकों से अनुरोध है कि - कांग्रेस, दिग्गी, लालू, सिब्बल इत्यादि की "शारीरिक", "भौगोलिक", "सामाजिक", "धार्मिक", "राजनैतिक", "आर्थिक" - सभी प्रकार की मजबूरियों को समझते हुए उनसे सहानुभूति रखें।
 

  • शुक्र है कम से कम कोई तो अपना काम ठीक से कर रहा है ...

    खबर मिली है कि बाबा राम देव को राम लीला मैदान में अपना अनशन शुरू करने के लिए दमकल विभाग का NOC नहीं मिला है ...

    दमकल विभाग का कहना है कि बाबा और अन्ना की आग से इस भ्रष्टाचारी सरकार रुपी रावण का जलना लगभग तय है तो NOC कैसे दे दें !?

भूख से मरते आदमी के लिए आज अपनी जान बचाने का एक तरीका है। वो घोषणा कर दे कि मैं सरकार के खिलाफ भूख हड़ताल पर बैठने जा रहा हूं। तभी उसकी सुध ली जाएगी!
 

कुछ शख्सियतों की यादें रसगुल्ले की रस की तरह जीवन में मिठास भरती हैं। मेरे लिए गुलजार की नज्में भी यही करती हैं। इसे ही देखिए- ये गर्मियाँ कितनी फीकी होती हैं - बेस्वादी। हथेली पे लेके दिन की फक्की, मैं फाँक लेता हूं...और निगलता हूं रात के ठन्डे घूंट पीकर,ये सूखा सत्तू हलक से नीचे नहीं उतरता...
 
गर्मी में बारिश की घुसपैठ,मतलब बारिश में सूखा....अब इसके लिए कहाँ अनशन किया जाये ?
 

  • सरकार बौरा गई है , बार बार कभी अन्ना से तो कभी बाबा के हाथों घिर रही है , लगता है अब इसके घिरने नहीं गिरने का समय नजदीक आ रहा है , फ़ेसबुक , ट्विट्टर और ब्लॉगिंग जैसे माध्यमओं पर अंकुश लगाने से सरकार सच को नहीं दबा सकेगी । वो और भी ज्यादा तीव्र होगा और एक दिन सरकार के सभी नियम कायदे धरे रह जाएंगे .
     
    पाकिस्तान में हल्ला है कि भारत सरकार पर जनता का दबाव है कि कसाब को फ़ांसी पर चढाने के लिए वो नया बिल लाए ...सुना है कोई जनलोकपाल बिल है ..

    • कसाब ने मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी के लिए अप्लाई किया है ,..ऊ बोडाफ़ोन का कनेक्सन चाहता है ..कह रहा था कि अबके तो कौन बनेगा करोडपति में फ़ास्टेस्ट फ़िंगर फ़र्स्ट तो खेलना ही है ...

    • कब तक पढूं जिंदगी , और कितना पढूं ....बता तेरे इम्ताहान कब खत्म होंगे ??
     
आज के लिए बस इतना ही , फ़िर पढेंगे कुछ चेहरों को , क्योंकि हर चेहरा कुछ कहता है , कहता है न ??