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रविवार, 17 जुलाई 2011

कुछ चेहरों की गुफ़्तगू तुम तक मैं लाया हूं ..




चलिए देखा जाए कि आज चेहरों सी पुस्तकों पर क्या किसने , कितना लिखा पढा है 



सो कर उठा तो मन के भीतर से किलकारियाँ फूटने लगीं। मुझे लगा कि जैसे अभी ही मेरा जन्म हुआ हो। सुबह से अब तक जन्म की वह खुशी मन में भरी है। हालाकि सांसारिकता मेरी किलकारियों पर बहुत भारी है।
 

किसी ने कुछ कहा हम खुश हो गए , किसी ने कुछ कहा हमें गुस्सा आ गया । ये भी कोई ढ़ंग है जीने का , कोई और हो गया हमारा नियंत्रण कर्त्ता । हमें स्वयं पर नियंत्रण स्वयं करना है और यही है जीवन जीने की कला ..
 
 

दिखायी देते हैं दूर तक अब भी साए कोई
मगर बुलाने से वक़्त लौटे न आये कोई
चलो न फिर से बिछाये दरियाँ, बजाये ढोलक
लगा के मेहँदी, सुरीले टप्पे सुनाये कोई
पतंग उड़ायें, छतों पे चढ़के मोहल्ले वाले
फलक तो साँझा है, उस में पेंचें लड़ाए कोई
उठो कबड्डी-कबड्डी खेलेंगे सरहदों पर
जो आये अब के तो लौट कर फिर न जाए कोई
नज़र में रहते हो, जब तुम नज़र नहीं आते
ये सुर मिलाते हैं, जब तुम इधर नहीं आते

-Gulzaar
 
 
 

कैसे जीते हैं फ़िक्र को बिस्तर पर सुलाकर
उड जाते हैं फिर इक आशियाना बनाकर
 

जिस देश को विदेशियों ने 1100 साल तक तलवार की नोक पर लूटा हो, उसके एक मंदिर में यदि एक लाख करोड रुपये की संपत्ति बची हो, तो जरा सोचिये कि भारत कितना संपन्न रहा होगा. लोग इसे सोने की चिडिया कहते थे तो वह सही कहते थे. अभी भी हिन्दुस्तान संपन्न है -- लेकिन अब इसे देशी लुटेरे लूट रहे हैं. जब यह बंद हो जायगा तो हम एक आर्थिक महाशक्ति बन जायेंगे.
 

हमने हर बार उनकी राह तकी,
हमने हर बार ख़ुद को समझाया.
उनके आने की उम्मीद फिर भी बाकी है,
इस तरह ज़िन्दगी को हमने बहलाया !
 

एक और मुक्तक

जो भेद खुल गया तो शर्मसार हो गया.
हर आदमी धंदे का तलबग़ार हो गया.
कोई राम बेचता है, कोई नाम बेचता,
संतों के लिये धर्म कारोबार हो गया.
--योगेन्द्र मौदगिल
 

आज एक शिकायत के साथ हाज़िर हूँ.. बहुत सारे दोस्त कहते रहते हैं कि 'बहुत मेल आती है, हम इसीलिए कमेंट्स नहीं करते' बस like करते हैं.. मगर क्या सिर्फ like कर देने से विचारों का आदान-प्रदान संभव है ? क्या like का button आपके मन की बात मुझे बता पाता है ? शब्दों को like button से replace करना कहाँ तक सही है ? वो भी तब जब ये problem सिर्फ १ minut में अपनी privacy setting में जाकर solve की जा सकती है
 
 
 

यू के का यॉर्क शहर - सालों साल धूप और बादलों के बीच चलती ठिठोली. कभी धूप जीत जाती तो कभी बादल जीत कर रिमझिम बरस जाते हैं. एक सिलसिला सा है जो कभी नहीं रुकता. .........
 
 

‎'सबक' बच्चे को पहला सबक ये ही सिखाया जाता है 'प्रेम' खुदा और नेचर की दी गई हमें सबसे बड़ी नेमत है और दूसरे सबक में ही सिखाया जाता है. प्रेम मत करना सबसे बड़ा कुफ्र है ये. या फिर साथ में इतनी सारी कंडीशन अप्लाई कर दी जाती है कि उन्हें ध्यान में रख कर कोई प्यार तो क्या ? ख़ैर नफरत करना भी पसंद ना करे ? फिर भी नेमत के लालच में बच्चे फसते ही हैं. रोकने वाले रोकते रह जाते हैं और करने वाले कर लेते हैं 'प्यार'
-बदचलननामा
 

सफलता के लिए अचूक मंत्र-
हमेशा क्लास में लेट पहुंचो, सारे टीचर तुम्हे याद रखेंगे।

कभी टेस्ट मत दो, बेइज्जती के दो नंबर से इज्जत की जीरो बढिया है।

कभी टाप ना करो, लोग तुमसे जलने लगेंगे।
 

शब्दोँ मेँ जिँदगी छुपी हैःलिखने की जी चाहता है ,बोलने का मन करता है ...ये अद्भुत संसार है ..ये जीवन की ऊँचाईयाँ है तो जीवन का बोझ भी..इसका स्वाद मीठा है या कड़वा भी...!!!आपको चुनना है अपनी जिँदगी!!!
 

पहले ऊगली पकड़ना रह्बर की, फ़िर उसे रास्ता दिखा देना
 

  • विवाह संस्था अपने आप में प्रेम के नाम पर प्रेम का नाश करनेवाली व्यवस्था है क्योंकि यह एक व्यवस्था है, रूटीन है जो प्रेम को खत्म कर डालती है। हमारे यहाँ विवाह बहुत कम आयु में कर दिए जाते हैं। विवाह की उम्र स्त्री के लिए ३०-३५ साल होनी चाहिए ताकि वह अपने कार्य, चयन के प्रति अपने अनुभवों के आधार पर निर्णय ले सके। प्रेमहीन विवाह निश्चित रूप से विवाहहीन प्रेम को जन्म देता है। -लवलीन
 
 

उसे छोड़ने के लिए पैदल ही निकल पड़ा कैंप। मुखर्जीनगर से आगे बढ़कर हम इंदिराविहार में थोड़ी देर के लिए रूक गए। उसने धीरे से कहा-तुम चले जाओ मैं अकेले निकल लूंगी, मैंने पूछा कहा चला जाऊं...ऐसे सवाल अक्सर हमें मोड़ पर खड़े कर देते थे। मैंने मुड़कर देखा तो हमदोनों मुखर्जीनगर मोड़ पर ही तो खड़े थे..(रवीश मैनिया..जारी)
 

हिंदी फिल्मों में अकसर किसी फिल्म के सीक्वेल के नाम के साथ "२" जोड़ा जाता है. जैसे मर्डर २, दबंग-२ लेकिन निर्देशक अभिषेक चौबे ने इश्किया के सीक्वेल का नाम इश्किया २ की बजाय" डेढ़ इश्किया" रखा है. फिलहाल फिल्म के नाम को प्रस्तुत करने का तरीका औरों से अलग है. फिल्म कैसी होगी, आगे पता चलेगा
 

सूरत भी खूबसूरत ,सीरत भी खूबसूरत
कोई नहीं जो आपका, अब सामना करे !!
 

संग कुछ घड़ी खेलना मेरा तब ही कतल करना
ऐ शैयार मैं उम्र भर तनहा यहाँ रहा हूँ
जिस शाख पे खुली आँख लहू गिराना मिरा वहीं
बाकी ज़माने भर में मैं फिरता यहाँ रहा हूँ
मेरी सूरत-ए-हाल पे हँसते हैं जो मुसाफिर
'मंजिल थी हर कदम पे मेरी' उनको जता देना
मेरी उम्र का पड़े गर अंदाज़ तो बताना
मैं खुद तो बेखबर हूँ कि कितना यहाँ रहा हूँ...
दीपक मशाल
 
 

हादसे भी खबर , हमले भी खबर , हैं लाशें खबर , असले भी खबर ,
हमने हैवानों को दी मौत की है सज़ा , काश , कभी ऐसी निकले भी खबर
 
 

5 टिप्‍पणियां:

  1. दोस्तों की अलग अलग 'दीवारों' पर लिखे खूबसूरत जुमलों से सीखने को भी बहुत मिलता है...इसलिए शुक्रिया कहना लाज़िमी लगा ... शुक्रिया :)

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  2. वाह आपकी खूबसूरत टिप्पणी के लिए विशेष शुक्रिया दीदी

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  3. पाँच मिनट में दस पोस्टों का 'कैप्सूल' ! भैया जिनको नहीं पढ़ा कभी,उन्हें भी मिला दिया ! धन्यवाद !

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