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शुक्रवार, 29 जून 2012

ये एक चालीस का लोकल नहीं है ..........





.Twitter तो .एक चालीस का लोकल है सरबा ....एक कोमा का भी बढोत्तरी होते ही आपको ...कान के नीचे कट्टा लगा के कहेगा ....आप एक ठो कौमा फ़ालतू लगाए हैं ...आप चतुर नहीं है ..और ढेर चतुर बनिए :) । मन तो करता है कै बार कि कहें । काहे बे ई एक सौ चालीस का लिमिट कोन हिसाब से डिसाइड किए हो बे । फ़ेसबुक में ई लफ़डा नय है , इसलिए मित्र सखा दोस्त सब एक से एक अभिव्यक्ति देते हैं , बानगी देखिए






  • रामायण में कहा गया है कि जब भी आप अपने दूर के रिश्तेदार को अपने पास बुलाते हैं, तो उस जगह का नष्ट होना निश्चित है। उदाहराणर्थ - शकुनि



‎''इस देश पर मुस्लिमों ने कभी शाशन नहीं किया, शाशन करने वाले कुछ ख़ास खानदान थे, मुगलों के समय से लेकर आज तक शाशन करने वाला वर्ग असरफ, पठान, शेख खानदानों से ही आता रहा है, कभी मुस्लिम समाज के पिछड़े अर्जाल और अजलाफ समुदाय से लोगों को नेतृत्व में आगे लाने का प्रयास किसी राजनितिक दल ने नहीं किया. चाहे वह भाजपा हो, चाहे कांग्रेस या फिर लालू जी, मुलायम जी की पार्टी. जब नेतृत्व सौंपने की बात आती है तो वह असरफ और शेख के हिस्से ही जाती है. हमें सोचना होगा, यह क्यों है?''
शीबा असलम फहमी


भला उसकी नजर में बनना बेहतर है ... जो खुद भला हो ..... कमीनों की नजर में क्या भला बनना ..... खुदा की खैर है .... कि सारे कमीनों की नजर में भले हम नहीं ..... हा हा हा ..... टिचक्यूं


मैं खयाल हूं किसी और का, मुझे सोचता कोई और है | मैं करीब हूं किसी और के, मुझे जानता कोई और है... [ सलीम कौसर ]



कवि ने कविता की पहली पंक्ति का बिम्ब उठाकर दूसरी में धर दिया! पहली पंक्ति ने भागकर कवि के खिलाफ़ हेरा-फ़ेरी और उठाईगिरी की रिपोर्ट लिखा दी।



  • तीन दिन पहले इन्दौर में तीन लोगों ने ड्रग्स के नशे में, तीन साल की बच्ची के साथ दुष्कृत्य करने के बाद उसकी हत्या कर दी…

    अब भड़की हुई जनता उन तीनों दरिंदों के लिए फ़ाँसी की सजा माँग रहे हैं…

    लेकिन ऐसी माँग करने वालों को क्या पता कि यदि किसी तरह इन राक्षसों को फ़ाँसी की सजा हो भी जाए, तो "ऊपर" कोई न कोई "गाँधीवादी" रसोई वाली बाई मिल सकती है…


बैठे बैठे ज़िन्दगी बरबाद ना की जिए,
ज़िन्दगी मिलती है कुछकर दिखाने के लिए,
रोके अगर आसमान हमारे रस्ते को,
तो तैयार हो जाओ आसमान झुकाने के लिए |



  • बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लंपट परधन परदारा॥

    तुलसीदास जी ने उपरोक्त चौपाई चाहे जिस भी यु के लिए लिखा हो, किन्तु यह वर्तमान समय में चरितार्थ हो रहा है।


हालिया फिल्मों में "पान सिंह तोमर" और "कहानी" ने जिस प्रकार मस्तिष्क पर अपनी छाप छोडी है, काश कि अनुराग भी इतने सृजनशील होने के बावजूद ,छोड़ पाते..उन्ही की बनायीं "ब्लैक फ्राइडे" और "उड़ान" अभी भी जेहन में एकदम ताजा है..



कल नीरज जी ने एक बात अपने उद्बोधन में बहुत महत्वपूर्ण कही .....उन्होंने कहा कि हम तो तब की पैदाइश हैं जब देश आज़ाद नहीं था ...आजादी से पहले आदमी का इतना नैतिक पतन नहीं हुआ था ....जितना बाद में हुआ .......आज़ादी के बाद देश में राजनैतिक आंदोलन तो बहुत से हुए .....लेकिन सांस्कृतिक आंदोलन एक भी नहीं .......इस देश को सांस्कृतिक आंदोलन की जरूरत है .......:)))



मेरी ज़िंदगी के साज़ पर तेरी आवाज़ ही बजती रहे
हर सफर में हम हमक़दम, ये राह यूं गुजरती रहे...



बैसाखियाँ न ढूंढो चलने को ज़िंदगी में,
कदम उठाओ अपना, छोटा ही सही.
.....कैलाश शर्मा



मैं खुद से घबराता हुँ लिट्ल मैन , बेहद घबराता हुँ । क्योंकि हमसे मनुष्य जाति का भविष्य निर्भर करता है । मैं खुद से घबराता हुँ क्योँकि मैं इतना किसी चीज से नहीं भागते जितना कि स्वँय से । मैं रुग्न हुँ बहुत रुग्न लिट्ल मैन । इसमें हमारा दोष नहीं लेकिन इस रुग्नता को दुर करना हमारा दायित्व है । अगर हम दमन स्वीकार नहीं करते तो हम उत्पीड़कों से कभी दब नहीं सकते थे । काश हमें पता होता कि हमारे बिना उनका जीवन एक घँटा भी नहीं चल सकता है । हमारे मुक्तिदाता ने हमलोगों को सर्वहार वर्ग कहा , सताया हुआ कहा लेकिन उसने हमसे यह नहीं कहा कि हम अपने जीवन के लिए सिर्फ मैं ही जिम्मेवार हुँ । (एक लिट्ल मेन)



‎"कलम से जिरह"

आज मेरी कलम नाराज़ हो गयी मुझसे
बोली आज हड़ताल है
कुछ नहीं लिखूंगी

बस हम दोनों की जिरह शुरू....

"थक जाती हूँ मैं
तुम्हारे साथ घिसते घिसते
ज़िन्दगी के किस्से भी तो
अजीबोगरीब हैं
ऊटपटांग बेसिरपैर की बातें
कहते कहते
गला सूख जाता है मेरा

अरे वही रोज़मर्रा की चिकचिक
तुम भी ना नाज़
कुछ और शौक ना पाल लेतीं
गातीं, नाचतीं, पेंटिंग करती
जब देखो मुझे ही घिसती रहती हो

जो गुज़र रहा है, गुज़र चुका है
वही तो दर्ज करती हो
नया क्या है?
आत्माभिव्यक्ति के नाम पर
मुझ बेचारी पर रोज़ ये ज़ुल्म

तुम्हे शायद लगता होगा कि तुम
अपने ज़ख्मों पे मरहम लगा रही हो
पर नहीं जानती तुम
कितनों के ज़ख्म कुरेदे हैं तुमने
कितनी भूली बातें
जबरन लौटा लाती हो तुम
जिसे लोग जानबूझ कर अनदेखा करते हैं
तुम वही परोस देती हो उनके समक्ष"

कलम की कही में कुछ और ही दिखाई दिया
खुद को तो वो देख ही नहीं पा रही
अपनी क्षमता से अनभिज्ञ है

बेवकूफ
अपना महत्त्व नहीं जानती
जब किताब में उकेरे जायेंगे
इसके लिखे अक्षर
और हो जायेंगे सच में 'अ-क्षर'
तब समझेगी ये अपनी ताक़त
अपने जीवन का मोल

यूँ तो टेक्नोलोजी का ज़माना है
जब हार जाएगी लैपटॉप से दौड़ में
तब जानेगी शायद
मैं इससे कितना प्यार करती हूँ
क्यूँ रोज़ इसकी गर्दन
फँसी रहती है मेरी उँगलियों में

और ये बस मैं ही जानती हूँ
मैं इसका साथ कभी नहीं छोडूंगी
विराम भले ही दे दूं इसे
कुछ समय को
थक गयी है ना बहुत

*naaz*




नूरे इस्लाम ने समझा था मुनासिब पर्दा,
शमा-ए-ख़ामोश को फ़ानूस की हाजत क्या है.



आँगन आँगन देव विराजे, आँगन आँगन भाव-भजन हैं
फिर जात-धर्म के मसलों पर, क्यूँ हम सब गूंगे-बहरे हैं ?


फेसबुक की दीवारों से अपने दुखों-चिंताओं का माथा न फोड़ें...दीवारें और भी हैं...



ईशा देओल ने शादी कर ली है...

भारतीय सिनेमा में उनका यह अमूल्य 'योगदान' हमेशा याद किया जाएगा !




बिखरने से डरता था

वह

सो

हँसता नहीं था!

23 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. शुक्रिया वन्दना जी , बहुत बहुत शुक्रिया आपका :)

      हटाएं
  2. आपकी पारखी नज़र के क्या कहने ! भूसे के ढेर में से मोतियाँ चुन कर ले आए।

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    उत्तर
    1. आभार आपका बहुत बहुत शुक्रिया जी ।

      हटाएं
  3. हर लेते है पल में संताप
    मोती चुनने वाले हैं आप

    उत्तर देंहटाएं
  4. are bhai bahut hi mehnatwa karte ho...
    chun-chun kar moti hmare samne dharte ho...
    dhanyawad.....

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    1. आपका शुक्रिया और आभार सुरेश भाई :)

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  5. चेहरे की किताब में चेहरे है बेहिसाब
    पर आप ढूंढ़ लाते है चेहरे नायाब !

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  6. वाह वान अजय भाई, गजब कर डाले हैं आप तो

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    1. शुक्रिया विवे्क भई आपका बहुत बहुत

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  7. कल 01/07/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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    1. पोस्ट को मान देने के लिए आपका शुक्रिया और आभार यशवंत जी

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  8. सुरेश चिपलूनकर जी के लिए
    सजा मांफी पर राष्ट्रपति सिर्फ हस्ताक्षर करता है असली काम गृहमंत्रालय करता है टिप्पणी उस पर होनी चाहिए |

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    1. अपने विचार यहां रखने के लिए शुक्रिया अंशुमाला जी

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  9. खूब सीरत पोस्ट....
    ऐसा भी हो सकता है नहीं....
    हो गया है
    सादर

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  10. कभी-कभी
    टाईपिं की गलती भी गजब ढा देती है
    अब देखिये न
    टाईप कर रही थी खूबसूरत
    और टाईप हो गया खूब सीरत
    चलिये चला लें इसे भी

    उत्तर देंहटाएं

पोस्ट में फ़ेसबुक मित्रों की ताज़ा बतकही को टिप्पणियों के खूबसूरत टुकडों के रूप में सहेज कर रख दिया है , ...अब आप बताइए कि आपको कैसी लगे ..इन चेहरों के ये अफ़साने